सोने का पिंजरा - रिश्तों की परिभाषा ब्लॉग


सोने का पिंजरा कहानी-  हम पंछी उन्मुक्त गगन के, पिंजर बंद ना गा पाएगे 
कनक तिलयों से टकराकर, पुलकित पंख टूट जायेंगे  । 

बचपन में यह कविता मुझे बहुत पसंद थी। मैं हमेशा ही इस कविता को जोर - जोर से पढ़ा करती थी । तब मुझे इसका मतलब नहीं पता था।पर यह कविता मुझे अपनी ओर आकर्षित करती थी। तब मैं इस कविता में लिखे दर्द को महसूस नहीं कर पाती थी। मुझे क्या पता था कि आगे चलकर यह कविता मेरे जीवन की सच्चाई बनने वाली है। आज मैं इसके दर्द को महसूस कर सकती हूं। मेरी शादी एक अच्छे परिवार में हुई। मेरे ससुराल में सभी सुख सुविधाएं हैं। बस है नहीं तो घर से बाहर जाने की आजादी। मैं यहां एक कमरे में कैद होकर रह गया हूं। मैं सिर्फ़ पिंजरे में कैद पंछी की तरह छटपटा तो सकती हूं  , पर  कुछ कर नहीं सकते हूं । मैं हमेशा से ही एक स्वाभिमानी लड़की थी। मैं अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी । मतलब कि नौकरी करना चाहती थी। पर शादी होते ही मेरा यह सपना टूट गया। मेरे ससुराल वालों को बहू का घर से निकलना भी मंजूर नहीं है, नौकरी तो दूर की बात है। ऐसा नहीं है कि मैंने इसका विरोध नहीं किया ,  मैंने बहुत चाहा कि मैं घर से बाहर जा नौकरी करुँ। पर मैं ऐसा कर नहीं पायी । पति ने भी साथ नहीं दिया। साथ देते भी तो कैसे आखिर उन्हें संस्कारी बेटा जो बनना था । 
पता नहीं मैं इस शादी रूपी कैद से कभी आजाद हो पाऊंगी या नहीं। शायद तब जब मेरी मौत मुझे अपने गले लगा लेगी। मैंने इस कैद से आजाद होने की हिम्मत कभी जुटा नहीं पाई। कभी समाज का डर, कभी बच्चे की ममता ने मेरे पैरों मे बेड़ी डाल दी ।
शायद  यही मेरी किस्मत है।ऐसा कहकर मैंने अपने मन को समझा लिया है ।

                                नीलू कुमारी 




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